आत्मा से आत्मकथ्य: नमन् केएन

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पूज्य अग्रज स्व ० श्री किशनानन्द जी को उनकी सातवीं पुण्य – तिथि के अवसर पर हार्दिक श्रृद्धाँजलि ! नमन् । …………………………………………………………….. आत्मा से आत्मकथ्य: नमन् केएन …………………………………….. गणपति सारदा की जै कहे हो नत मोहन जोशी। उन्नीस सौ इकसठ की फरवरी थी तारीख चौबीसी।। था शुक्ल पक्ष जनम दुर्गा सुत किशनानन्द जोशी । मैंदोलियो की शाखा हुई पुष्पित और परितोषी।। निज स्मृति अमिट को पुष्ठ करने आज मैं कुछ सोचता हूँ। खयालों में तुम्हारे भटक कर यादें पुरानी खोजता हूँ ।। लिख रहा हूँ प्रेम अक्षर जो मेरे संज्ञान में है। शब्द है भारी प्रिय अग्रज मूरत जो मेरे ध्यान में है।। कहती इजा थी सात वर्ष तक ठंडा पानी नहीं पिया। गया था एक अग्रज कैलाश और तुम ये अंधेरों हेतु दिया। माँ हम सब की पेट पूजा को रोटी लेसुवा सेने। वो जाती नित छतइया ढेर सारी लकड़ियाँ लेने।। प्यासी फूँकती थी गर्म जल तृष्णा बुझाती थी। फिर ममता तुम्हारी तरफ आ किशना बुलाती थी।। बड़े थे बाल बचपन के चन्दन माथे पर पोता । तुम ताऊ शम्भु के काँधे पै बैठे देखते तोता ।। दीदी देवकी और जानकी तब लट बनाती थी। पाठी पोतती थी हाथ से लिखाना सिखाती थी।। बचि पणज्यू के प्रिय तुम शिष्य मित्रों के परम प्यारे । एक ही प्यारा बालक था तब धारफाट में सारे ।। घर घर से च्यूड़ घुघुते आशीष देते थे।। पल भर तुम्हें न पा वो बेचैन होते थे।। अनुज दयालू और सुरेश जब छोटे-छोटे थे। कराते थे उन्हें तुम शान्त तब जब वे भी रोते थे ।। राजू और मेरी जोड़ी बैल की आँगन में जोते थे। परमानंद के आँगन में जब जब बहिन भाई होते थे।। परम ये प्रीति हा विधिना क्या कर गया ऐसा । कहाँ खोजूँ जगत पाऊँ में भाई आपके जैसा। तुम्हारी याद है और प्राण तन पुलकन नहीं वैसी। नहीं चितवन चितेरो की वो चितवन आपकी जैसी। विधि ने लिख दिया क्या हाय कैसा विरह सूनापन । दिवस में ही हुई अधरात नखत भी ढाँप देता घन।। मुझे सब याद आते है वो तुम संग खार की गलिया। पकड़ कर तुम दिखाते हाट नन्हीं थी मेरी अंगुलियाँ ॥ वो परमानन्द की खोली भोला सिंह की चाल बॉम्बे नगरी। देवभूमि के लोग अहा वो संगी साप्ताहिक भजन मंजरी।। ठुम-ठुम नाचते तुम प्रिय सबके कमर लचकाते । क्या बात बातों की मधुर आवाज में गाते।। क्या पता विधि को भी जरूरत आ पड़ी होगी।। आधी उमर में ही कर दिया उसने तुम्हें रोगी।। पचहत्तर की थी बात बाबू को कुमरीकोट मन भाया। रात दिन कर कर मेहनत एक चौकमरा घर बनवाया।। एसएससी पास बीएल रुइया कॉलेज बॉम्बे से करवाया। फिर मुम्बई बाबू से सीखा मोटर ज्ञान लाइसेंस पाया।। सोलह साल में बाम्बे टैक्सी चालक के एन कहलाया।। राजेश, रंजीत के वाहक यान और भी कई कई नाम। तुम सफल चालक प्रण प्रतिपालक सत्साहस के धाम।। फिर वाबू के धन्दे में कुछ हाथ बटाया घर सम्हाला। रात पाली में टैक्सी चलाता केएन ड्राइवर मतवाला।। उन्नीस में शादी कर घर नौटाँ की गंगा ले आये। अब हुई हमारे साथ खुशी कि दद्दा घर आये ।। एक तरफ थे चिंतित मन दुःखी कि बाबू की बिमारी। कर्ज भरे वो दिन और सिर पर थी दुनियादारी।। अकेला घर था सोचा कुछ और अच्छा घर बनाएं ।। वहीं पर रहे परिवार कुछ करें हुनुर कमाएं खाएं ।। अरे ये कितना दूर बैठा आदमी खबर महिनों में पाता।। साल दो साल में भी कितना घर क्या बचता कमाता ।। ये रात दिन की पालियाँ थक जुटती नहीं बतासे। न जाने कौन से व स्वप्न को आँखों में तराशे ।। यही वश वेदना को समझा दर्जी बन गए तुम । बॉम्बे टेलर गरुड़ ग्वालदम व बागेश्वर में उद्यम ।। नये थे प्रयोग कितने तुमने कर बानिक अपनाए । रुचिकर बना बना परिधान तुम लोक हिय हर्षाए ।। काँग्रेस के ब्लॉक महामंत्री गए देहरादून कई बार । जनहित तत्पर मन शुद्ध भाव से सेवारत साकार।। बेटा अनिल जब से जीआइसी अल्मोड़ा नौ में गया था । तब से अब तक वो भी घर में निवसित कब रहा था। तनया चम्पा की शादी भगवानपुर, गोलू नाती को कहते थे। कुमारी ममता की शादी की अब अकसर चिन्ता में रहते थे।। श्री गणेश तनया हेमा सुन्दर बहू भली मर्यादित पाई। दो हजार ग्यारह में श्री अनिल की हो गई सगाई ।। सारे मुदित थो परिजन वो घड़ी शुभ परम बेला। छल्योरों की ठुमकती रात नृतकोंतक का रहा था मेला।। प्रगतिशील कृषक तुम अर्द्ध शत – शत पंछी की शाला। किसे तुम छोड़ जाते हो अखिल घर ये गौशाला।। पूजा बेटी सम पल्लू गुड्डु भास्कर भानू गौरव भतीजा। रेनु बीना चचेरी शान्ति शोभा परिया और बूढ़ी जेड़जा। रामलीला के मंच में मन्थरा बन कैकई को सूझाते । कभी तुम कै कई बन राम को वन वनवास दिलवाते ।। कभी वन्दीजन बने तुम विदेह प्रण को गाने में गाते । कभी फिर सुमन्त के तुम वेष में रघुवर को समझाते ।। कभी हम सुग्रीव तुम बाली बने हम राम तुम सीता। वो कितना सुखद अवसर था वो समय जो बीता।। कितनी जोर से ताली और सीटी की आवाजें । जब रामलीला के मंच पर सूर्पनखा उतरती थी।। कितने चाव से श्री राम वन बेरो के चबाते थो । शबरी बन कभी जब अपनी कुटिया में देती थी।। अरे वो धनुष – यज्ञ में आता डोटी की राजा। ‘मि डोटी डोट्याल हो चाँण – गुड़ ‘ को गाता।। कभी मीना बाजार में चने का गीत वो गाता। विभीषण बन सहज ही राम के चरणों में जाता।। सलोने मुखा से आती थी मधुर मुस्कान संगत में । धरा भी मुस्कुराती थी था आसमान रंगत में।। श्रमशील कर थकते नहीं थे साध्य पाने को। नित नित नवल अनुराग था आराध्य पाने को।। नहीं तुम विश्वास होता है धरा पर कभी रहा होगा। तुम सा प्रिय न है कोई न और कोई अब होगा ॥ लिखि थी जितनी ब्रह्मा ने सभी ने उतना ही भोगा।। है वो कौन शक्ति जिसने अपने देह को रोका ॥ मापक कौन उसका जिसे दुनिया है उम कहतीं। ये बदलाव जो शाश्वत बस महसूस है होती।। करिश्मा है यही उसका कि परिवर्तित धोती।। आत्मा अमर रहती है अवस्थित ब्रह्म मे होती ।। चराचर विश्व के पालक की माया अजब है करनी । अभी तुम चल रहे थे सामने और गिर पड़े धरणी ।। अगर ये जानता कि हो गई तुम्हारी बावनी पूरी। आधे सफर में ही हो गई तुमसे अगम दूरी।। पास आकर बैठ मै दिल खोलकर कहता। सुन कर अमृत सम बोल न मलाल कुछ रहता।। भाईपन की सीमा तुम अमर सद्भाव संवाहक । हे मेरे राम से भैया तुम शुचि शशि मैं चातक ।। अधूरे स्वप्न पूरण को अनुहारी है हम समय अनुचर। सुखी तुम इन्द्रपुर में वास करना परमधाम पा कर । बाबू गये इजा से दो साल दो महिने दो दिन पहले। चार महिने और पाँच दिन इजा भी तुमसे पहले ।। बताए बिन गए तुम हमसे एक दिन हम भी आयेंगे | विरह की वेदना कैसी व्यथा तब तु म को सुनाएंगे ।। पुनः फिर रामलीला मंच पर तुमको राम बनना है। मुझे फिर लखन बन कर आपको प्रणाम करना है।। हे मेरे प्रिय अग्रज हे मेरे प्राणप्रिय के एन। नमन शत कोटि चरणों पर करता तुम्हें मोहन ।। बड़े सौभाग्य ही हर किसी को भाई मिलता है। भाई पन हो भाई में तो जीवन भी खिलता है।। जाना दु खाद कितना आत्मा को बज़्र सा भारी। अरे ये वेदना कितनी भयावह निशा विरह कारी । क्या तुम्हें अर्पण कर मैं भाव-सुमनों के सिवा। प्रेम की बाती धरी है प्रिय प्राण बनते हैं दिया।। ये दुनिया याद रखेगी हमारी प्रीति को अकसर । घन नद पर्वत दिश बोलेंगी और बोलेंगे प्रस्तर।। जून पाँचवीं तारीख विश्व पर्यावरण दिवस मनाकर । सरयू के तट बेणी माधव बैजनाथ की शरण को पाकर।। अंतिम दर्शन दे हुए विलीन पावन पावक में समा कर। परम शान्ति दे परमेश्वर हे कृपा करो करूणाकर ॥ अमर है पुण्य धरती पर किये सत्कर्म जो जग जीवन। रहा कौन भू पर सदा रूका कब नश्वर प्राण और तन।। तुम्हारे मित्र बांधव सब कुटुम्बी चिर परिचित जन । नै नौ से बहाते अश्रु अविरल हुए शिथिल सब तन । हे मेरे परम प्रिय अग्रज हे मेरे प्राण प्रिय के एन । नमन् शत कोटि चरणों पर करता अनुज मोहन।। ………………………………………………….. दिनांक- १०-०५-२०१३ # ‘आत्मा से आत्मकथ्य नमन केएन ‘ ……………………………………………. मोहन जोशी

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