चंद्रशेखर बड़सीला, गरुड़
यों तो नन्दा देवी की पूजा अर्चना कुमाऊं व गढ़वाल में पुरातन काल से ही सनातन रुप से की जाती है।लेकिन मां के भ्रामरी रुप में पूजन का अनुष्ठान मात्र कत्यूर घाटी के कोट मंदिर में ही किया जाता है।कोट मंदिर में भाद्रपद की अष्टमी को मुख्य मेला अपने पूरे यौवन में आयोजित किया जाता है। इसमें कुमाऊं व गढ़वाल के हजारों श्रद्धालु आकर मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं।
कत्यूर घाटी में सातवीं ईसवीं तक यहां पर कत्यूरी राजाओं का शासन रहा।इन्हीं कत्यूरी राजाओं ने कत्यूर घाटी के महत्त्वपूर्ण स्थानों को किले के रुप में स्थापित किया गया था।वर्तमान कोट मंदिर को भी किले का रुप दिया गया था।मंदिर की स्थापना के संबंध में कहा जाता है कि कत्यूर क्षेत्र में अरुण नामक दैत्य का बेहद आतंक था।उसी दौरान कत्यूरी राजा आसन्तिदेव व बासन्तिदेव कत्यूर को राजधानी बनाने यहां आए।तब इन दोनों कत्यूरी राजाओं का अरुण दैत्य से घमासान युद्ध हो गया।युद्ध न जीतने की स्थिति में इन राजाओं ने भगवती मां को अपनी व्यथा सुनाई और समाधान मांगा।विधि विधान से पूजा अर्चना करने के बाद मां भंवरे के रुप में प्रकट हुई तथा मां ने अरुण दैत्य का वध कर दिया।राजाओं को दैत्य से मुक्ति मिली और उन्होंने यहां अपनी राजधानी बनाई।मैया की इसी असीम अनुकंपा के कारण ही मैया की भंवर के रुप में पूजा की जाती है।कोट मंदिर में कत्यूरी राजाओं की अधिष्ठात्री देवी भ्रामरी तथा चंद वंशावलियों द्वारा प्रतिष्ठापित नन्दा देवी की स्थापना की गई है।भ्रामरी रुप में देवी की पूजा अर्चना यहां पर मूर्ति के रुप में नहीं बल्कि शक्ति के रुप में की जाती है बल्कि शक्ति के रुप में की जाती है जबकि नन्दा के रुप में मूर्ति पूजन, डोला स्थापना व विसर्जन का प्रचलन है।