तितली बहिना (बाल – कविता)

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मोहन चंद्र जोशी, मोहन आश्रम, गरुड़

तितली बहिना तितली बहिना।
क्यों चुप -चुप दिनभर रहती हो।
सबकी बातें तो सुन लेती ,
पर मुख से कुछ ना कहती हो।।

सुबह किरण के साथ – साथ,
तुम कलियों को हर्षाती हो।
चूस – चूस मकरन्द मधुर,
तुम अपनी प्यास बुझाती हो ।।

रंग – बिरंगे पंखों को तुम,
बार – बार हिलाती हो।
पेड़ – पेड़ की डाल – डाल पर,
कितना आती जाती हो।।

कोमल – कोमल सुन्दर पंखों से,
मेरे मन को लुभाती हो।
रंग नये भर कर अंगों में,
क्यों सपनों में आती हो।।

फूल – फूल में बैठ – बैठ तुम,
किसको पास बुलाती हो।
मेरे गीतों को सुन – सुन तुम,
मन्द – मन्द मुस्काती हो।।

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