पहाड़ में बंदरों के आतंक ने जीना हराम कर दिया है पहले पहल फल के पेड़ों से इन बंदरो ने गांव में फल के कारोबार को खत्म किया,फिर उपजाऊ जमीन में शाक सब्जी उजाड़ दी,अनाज फसल को खत्म कर दिया,बच्चों महिलाओं व बुजुर्गों को काटना शुरू कर दिया अब घरों के दरवाजे खोलकर अलमारी फ़ीज़ में रखे सामान उड़ाना तथा छत में रखी पानी टंकी के पाइप,ढक्कन तोड़ा देना और तो और घरों के छत में लगे डिश एंटेना को भी खराब कर देना आम बात हो गयी है।
गरुड़ में बंदरों की समस्या से लोग बहुत परेसान है स्थानीय लोगो के द्वारा बार बार इस समस्या के समाधान के लिए मांग की जा रही है लेकिन कोई सुनने वाला नही है यहाँ तक कि पिछले 2 बार के विधानसभा आम चुनाओं में बंदरों की समस्या के निदान को प्राथमिकता पर रखने के आश्वासन पर मोदी लहर में तीसरी बार चुने गए चंदन राम दास भी इस मामले में असहाय चुप बैठे हैं। जनता का कहना है कि वो जाए तो जाए कहा।
ऐसा नही है कि स्थानीय लोगो ने हाई कोर्ट का दरवाजा नही खटखटाया, भेटा निवासी जनार्दन लोहनी, मंटेना निवासी चन्द्र शेखर बड़सीला,सेणु निवासी सतीश जोशी ने बागेश्वर निवासी अशोक लोहनी व भूपेंद्र जोशी के साथ संयुक्त रूप में जनहित याचिका हाई कोर्ट नैनीताल में 2016 में दाखिल की जिसपर इसी वर्ष सरकार को बन्दरो की समस्या पर उचित कार्यवाही करने के अंतिम आदेश भी हाई कोर्ट से हो गए हैं।
चुनाव दर चुनाव में बढ़ चढ़ कर भाग ले रही जनता की आवाज आखिर कौन सुनेगा यही सबसे बड़ा प्रश्न सबके सामने है।
सही कहा आपने उसके बारे में तुरंत आवाज उठानी पड़ेगी
Ye samasaya bahut hi vikral roop le rahi hai…palayan ka ek mukhya karan bhi bandaron ki bardti sankhya hi hai
पलायन मुखी होने का अहम् कारण जंगली जानवर विशेष कर बंदरों ने तो जीना हराम कर दिया है,ये कटखने जब तक योंही अभिशप्त बने रहेंगे,लोग पेट की आग बुझाने के लिए अन्यत्र पलायन करते रहेंगे।
शासन/प्रशासन को युद्ध स्तर पर संज्ञान लेना चाहिए जैसा कि हमारे माननीयों ने चुनावी वादों में संकल्प लिया था।