भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कत्यूर घाटी के स्वतंत्रता सेनानियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है।उस समय पर्वतीय क्षेत्र में यातायात के साथ ही संचार के साधनों का भी एकदम अभाव था।इसके बावजूद भी यहां के जिन वीर योद्धाओं ने अपना सुख चैन छोड़कर विषम पहाड़ी इलाके में पैदल घूम-घूम कर कत्यूर घाटी व अन्य क्षेत्रों में आजादी की जमीन तैयार की, उन्हीं में से एक थे- प्रेमानन्द खोलिया।प्रेमानन्द खोलिया का जन्म ग्राम मटेना, गरुड़ तत्कालीन जिला अल्मोड़ा ( अब बागेश्वर ) में जैराम खोलिया के घर में हुआ था।साल 1941 के व्यक्तिगत आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें अदालत न उठने तक कि कैद व 40 रुपए अर्थदंड तथा न देने पर दो माह के कठोर कारावास की सजा हुई।वर्ष 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण कठोर कारावास तथा बेंतों की भी सजा दी गई।प्रेमानन्द स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय, कर्मठ व वीर सैनिक रहे।प्रेमानन्द खोलिया पूर्व बीआरसी समन्वयक व वरिष्ठ शिक्षक उमेश जोशी व शिक्षक मोहन चंद्र जोशी के नाना थे।आजादी के आंदोलन में उनके द्वारा दिए गए योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।
लेखक – चंद्रशेखर बड़सीला, गरुड़