शिक्षा को समर्पित थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्र दत्त ममगई

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शिक्षा को समर्पित थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्र दत्त ममगाई
  • गरुड़ में स्कूल की स्थापना कीचंद्रशेखर बड़सीला, गरुड़देश की आजादी में कत्यूर घाटी के सेनानियों का भी विशेष योगदान रहा है।इन्हीं सेनानियों में से एक थे – चंद्र दत्त ममगाई।चंद्र दत्त ममगाई का जन्म ग्राम गड़सेर में भगीरथ ममगाई के घर मे हुआ था।चंद्र दत्त के मन मे बचपन से ही देशभक्ति का गजब जुनून था।1921 में कुली बेगार आंदोलन से वे काफी प्रभावित हुए।1929 में अब महात्मा गांधी गरुड़-कौसानी- बागेश्वर की यात्रा में थे, तब बापू कुछ समय गरुड़ के ऐतिहासिक गांधी चबूतरे पर रुके।यहीं गांधी जी के भाषण सुनकर चंद्र दत्त के मन में आजादी का ऐसा गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने फिर कभी पीछे नहीं देखा।निरंतर देश की आजादी के लिए घर-घर जाकर अलख जगाने लगे।वे लोगों को आजादी के साथ-साथ पढ़ाई के लिए भी प्रेरित करते थे।1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें 18 अगस्त 1942 को एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा हुई।19 नवंबर 1943 को उन्हें जेल से रिहा किया गया।जेल से छूटने के बाद उन्होंने आंदोलन और तेज कर दिया।1947 में देश आजाद हो गया।इसके बाद भी चंद्र दत्त ममगाई समाज सेवा के कार्यों में लगे रहे।वे हमेशा कत्यूर के नानिहालों की शिक्षा के लिए चिंतित रहते थे।इसलिए उन्होंने गरुड़ में अपने कुछ साथियों के साथ मिडिल स्कूल(किसान कृषि विद्यालय) की स्थापना की, जो कालांतर में राइका गरुड़ के रुप में क्षेत्र के नौनिहालों का भविष्य संवार रहा है।उनके पौत्र भुवन चंद्र ममगाई भी वर्तमान में शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं।क्षेत्र के लोगों ने राइका गरुड़ का नाम उनके नाम पर रखने की मांग की है।
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