हल्द्वानी टू आनंद विहार

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पहाड़ का आदमी दिल्ली में रचने बसने लगा है। जिसे देखो वो कहता है दिल्ली जा रहा हूँ नॉकरी करने। अब जाए भी क्यों ना, मजबूरी ठेरी। चलिए ये तो अलग विषय है जिस पर अलग से चर्चा होनी चाहिए। पिछले साल मैं किसी काम से दिल्ली निकल गया। हल्द्वानी स्टेशन से उत्तराखंड परिवहन की बस में सफर करना ऐसा लगता है जैसे घर के ही लोग साथ मे सफर कर रहे हैं। कोई डर नही, कोई चिंता नही। अब हम पहुंचे दिल्ली ,अपना सारा का निपटाया और वापसी के लिए फिर आ पहुंचे आनंद विहार बस अड्डा। रात के 10 बजे थे, स्टेशन में हल्द्वानी की एक भी बस नही थी। दो गाड़िया थी एक रामनगर और दूसरी काशीपुर डिपो की। किसी सज्जन से मैने पूछा कि क्या आज कोई त्योहार या छुट्टी है जो यहां पर बसों का अकाल पड़ा हुआ है। सज्जन ने कहा दाज्यू चुनाव में ड्यूटी लागि रे, ये लिजी बसों भोते मारा मारी छू। अब मुझे भी अगली बस का इंतजार करते करते करीब 1 घण्टा हो गया था लेकिन उत्तराखंड परिवहन तो छोड़िए, उत्तरप्रदेश परिवहन की बस भी नजर नही आई। अब तो जनाब रात के 12 बजने को आ गए। मेरे जैसे कई यात्री हैरान परेशान स्टेशन पर बस के इंतजार में बैठे थे। अगल बगल प्राइवेट बसों के दलाल चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे , छ सौ रुपये फुल ऐसी हल्द्वानी। मैने उन्ही सज्जन से दुबारा पूछा कि ये फुल ऐसी बस में क्यों नही चले जाते, 2,3 सो ज्यादा लग जाये कोई बात नही,घर तो पहुंच जाएं। महाशय ने कहा- भाईसाब पिछली बार मैं भी इनके चक्कर मे फंस गया था, ये लोग यहां छ सौ बोलते हैं और वहां बस में आठ सौ से भी ज्यादा वसूलते हैं।
जालसाजी का ये काम यहां हर दिन होता है और कोई न कोई भोला भाला यात्री इनके चुंगल में फंस जाता है। खैर बस के इंतजार में हम बैठे ही थे कि हल्द्वानी वाले प्लेटफॉर्म पर एक बस आयी जो उत्तरप्रदेश परिवहन जैसी लग रही थी और हल्द्वानी जाने के लिए उसका कंडकटर आवाज दे रहा था। हमे लगा चलो उत्तरप्रदेश परिवहन ही सही लेकिन रात के 12 बजे कोई गाड़ी आयी तो सही जो हमे घर छोड़ेगी। मैं और मेरे जैसे कई यात्री बस में बैठ गए और करीब 1 घंटे तक गोल गोल चक्कर लगाने के बाद वो बस रवाना हुई। अभी आधे रास्ते ही पहुंचे थे कि बस ड्राइवर ने बस गलत रास्ते चढ़ा दी और बस बैक करने लगा, पीछे गहरी खाई थी। यात्री चिल्लाने लगे और बस से उतरने लगे। किसी तरह बस बैक हुई और वापस सही रास्ते पर आ गयी। सवेरे के लगभग 6 बजे थे, बस रामपुर और विलासपुर के बीच में थी जहां हाइवे का काम चल रहा है और रोड उबड़ खाबड़ , धूल भरी बनी हुई है। सभी यात्री सोये हुए थे, कुछ लोग जगे हुए थे, तभी एक जोर का झटका लगा और बस झटके में एक किनारे को फिसल गई। जब तक कोई कुछ समझ पाता, तब तक बस का अगला हिस्सा चकनाचूर हो गया था, शीशे टूट गए थे। सभी लोग बाहर उतरे तब पता चला कि बस ड्राइवर ने नींद के झोंके में एक पिकउप को टक्कर मार दी थी। पिकउप ड्राइवर को सर में काफी चोट आई थी लेकिन बस में सवार सभी यात्री सकुशल थे। उसके बाद यूपी पुलिस आयी और पूछताछ हुई तब जाकर हमे मालूम हुआ कि ये बस तो प्राइवेट थी जिसने उत्तरप्रदेश परिवहन जैसा ही रंग करवाया था। इस बात का अंदाजा मुझे तभी हो गया था जब मैने आनंद विहार बस अड्डे से बाहर निकलते वक्त बस ड्राइवर को एक कर्मचारी को पैसे देते हुए देखा था। यात्रियों के साथ फर्जी और इस तरह की धोखेबाजी दिल्ली आनंद विहार बस अड्डे पर हर रोज चल रही है लेकिन किसी की हिम्मत नही है कि सरकार को इस सब से अवगत कराया जाए। सरकार भी अपनी आंखें मूद कर सोई हुई है। उसे जनता की परेशानियों के साथ कैसा सरोकार। अब ये हम पर निर्भर है कि या तो ऐसे फर्जी जालसाजी के खिलाफ आवाज उठाएं और लताड़ लगाएं इस लचर होती व्यवस्था के तथाकथित संरक्षकों को या फिर हमेशा की तरह हम भी अपनी आंखें मुद लें।
सुंदर बोरा, journalist
(नोट- ये लेखक का अपना व्यक्तिगत अनुभव है)

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