ग़ज़ल ( कुमाउनी )

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‘कठिन ‘
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कौंण भौतै सितिल छु और करण कठिन।
मरण-मारण सरल छु , पराँणि धरण कठिन।।

भौतै असजिल हैगींना बदिया – ब्वाज् हि का।
पछिल – पछिलै रड़णीं, अघिल सरण कठिन।।

बीच सोटों में बगन भौतै असेटीण भैगे।
जिन्दगी थाकि गे, अघिल तरण कठिन।।

बेफिकर हैबे निकर तौं चुपाड़ र्वाट तरकन।
कर्जक् घ्यु खाँण् स्वादिल, हौं भरण कठिन।।

कैकै सुख आइलै छु सुकी र्वाटाँ परि ‘ मोहना’।
डंगारौं कैं फाँदि दुहर क् दुख हरण कठिन।।
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मोहन जोशी, गरुड़, बागेश्वर, उत्तराखण्ड।

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