मुछ्याव जगाऔ – गोपाल दत्त भट्ट

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जून हराणी और बुसीगीं तार्
दगाड़ियो मुछ्याव जगाओ।
धारम ठाड़ है धात लगौनूँ
.थान-थान में बात् जगौनूँ
देई -देई में आग् जगौनूँ।
जुलम करण फैगोछ भौत अन्यार,
दगड़ियो मुछ्याव जगाओ।।
जो धर्ती की पीड़ बतौंछी
जो आगा का क्वीड़ बतौंछी
जो यो सेतिया भीड़ जगौंछी –
लुकिना जाणि को उङ्यार,
दगड़ियो मुछ्याव जगाओ।।
जो बइया की बाँह थमौंछी
डन्यागी कइया नाग नथ्यौछी
द्वार – द्वार जो किरण पुजौंछी
मुनई लटकै बेर भै रीना बौण्यानू -दरबार
दगड़ियो मुछ्याव जगाओ।।
हत्यार हमारा खौईगीं
धुर-धार पीड़लै बौईगीं
बदजात बादव बौई गीं
अर सूरज है गो बिमार
दगड़ियो मुछ्याव जगाओ।।
फूलों की बास हराँणेंछौ
डबलों में लाज ब्यचाँणैछौ
बिन कफनै लास जाँणेंछौ
गाव – गवाँ अगो कच्यार,
दगड़ियो मुछ्याव जगाओ।।
. . . . . . . . . . . . . . . . . . .
गोपाल दत्त भट्ट, ‘साकेत’ गरूड़

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