‘गजल’-“जिस तरह”

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छूकर हवा निकल गई सागर को जिस तरह।मुश्किल हुई है जिन्दगी लहर हो जिस तरह।।भँवर को किस तरह से नाकाम हम करें।लगता है जिन्दगी की फिकर हो जिस तरह।।सदियाँ गुजर गई हैँ उनके इन्तजार में।जल के लिए चातक का सबर हो जिस तरह।।तूफ़ाँ से इसलिए हम बचकर निकल गए।माँ की दुआ का सच्चा असर हो जिस तरह।।मेरी नजर के सामने हर वक्त हर घड़ी।हिम के त्रिशूल की बड़ी शिखर हो जिस तरह।।खुशी की बयार ले उड़े गम के घनों को दूर।खुशहाल जिन्दगी का सफर हो जिस तरह।वो खड़े – खड़े खुशी – खुशी ‘ मोहन ‘ निकल गए।किसी अखबार की अच्छी सी खबर हो जिस तरह।।………………………………………………………मोहन जोशी
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