संविधान में हमारे मूल अधिकार- संक्षिप्त विवरण

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71वे गणतंत्रदिवस 2020 के अवसर पर सभी भारतीय नागरिकों को बहुत बहुत बधाई।

26 जनवरी 1950 को लागू भारत का संविधान( 22 भाग,395 अनुच्छेद,12 अनुसूची) जहाँ एक तरफ सक्षम व सत्ताधारी लोगो के लिए उनकी सभी तरह के अधिकारों के दृष्टिगत करीब करीब पूर्ण रूप से लागू है वही हम भारत के लोग जो संविधान में प्रदत्त शक्तियों व अधिकारों के मूल स्रोत हैं के लिए संविधान अभी भी एक सपना ही बना हुआ है।

यहाँ फिलहाल यदि केवल मूल अधिकारों की बात करें तो ‘समता का अधिकार’ अर्थात अनुच्छेद 14 में प्रदत्त ‘विधि के समक्ष समता के अधिकार’ के सम्बंध में स्पष्ट उल्लिखित है कि राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से बंचित नही करेगा।यद्यपि यहाँ युक्तियुक्त वर्गीकरण का निषेध नही है बशर्ते कि वर्गीकरण मनमाना नही होना चाहिए जिसके लिए दो शर्तो का पूरा होना आवश्यक है(1)वर्गीकरण एक बोधगम्य अन्तरक पर आधारित होना चाहिए,और(2) अन्तरक और उस उद्देश्य में तर्कसंगत सम्बंध हों

जहाँ तक भेदभाव विभेद के प्रतिषेध का प्रश्न है इसके लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 उल्लिखित किया गया है कि(1) धर्म,मूलवंश,जाति,लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर राज्य किसी नागरिक से विभेद नही करेगा,(2)कोई नागरिक केवल धर्म,मूलवंश,जाति,लिंग,जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर-(क)दुकानों,सार्वजनिक भोजनालयों,होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश,या(ख) पूर्णतः या भागतः राज्य-निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं,तालाबो,स्नानघाटों,सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग,के सम्बंध में किसी भी निर्योग्यता,दायित्व,निर्बंधन या शर्त के अधीन नही होगा।
इसी अनुच्छेद में बच्चों ,महिलाओं,सामजिक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के लिए राज्यों को विशेष प्रावधान बनाए जाने से निवारित नही किये जाने की व्यवस्था भी दी गयी है।

अनुच्छेद 16 ‘लोक नियोजन के विषय मे अवसर की समता’ की बात करता है जिसमे(1) राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी।(2)राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के सम्बंध में केवल धर्म,मूलवंश,जाति,लिंग,उद्भव,जन्मस्थान,निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।(3) इस अनुच्छेद की कोई बात संसद को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नही करेगी जो किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र की सरकार के या उसमें से किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन वाले किसी वर्ग या वर्गों के पद पर नियोजन या नियुक्ति के सम्बंध में ऐसे नियोजन या नियुक्ति से पहले उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के भीतर निवास विषयक कोई अपेक्षा विहित करती है ।
इसी अनुच्छेद के अंतर्गत लोक नियोजन में आरक्षण हेतु अनुसूचितजातियों व जनजाति के वर्ग हेतु प्रावधान बनाने के लिए निवारित नही किये जाने का प्रावधान भी किया गया है।
अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता तथा अनुच्छेद 18 में उपाधियों के अंत का प्रावधान किया गया है।

नागरिकों मूल अधिकारों में स्वातंत्र्य अधिकारों का स्थान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में दिया गया है जिसके अंतर्गत(क)वाक-स्वातंत्रता और अभिव्यक्ति स्वातंत्र( अभिव्यक्ति की आजादी)का,(ख)शांतिपूर्वक व निरायुध सम्मेलन का(ग)संगम या संघ(या सहकारी समितियों) बनाने का,(घ)भारत के राज्य राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का,(ङ) भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने का और (छ) कोई वृत्ति,उपजीविका,व्यापार या कारबार करने का,अधिकार होगा। यद्यपि युक्तियुक्त निर्बंधन की व्यवस्था का भी इस अनुच्छेद में उल्लेख किया गया है।
यहाँ यह उल्लेख भी करना आवश्यक है कि रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के मामले में भारत के उच्चतम न्यायालय ने संप्रेषित किया है कि वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी प्रजातांत्रिक संगठनों की आधारशिला है। एक अन्य महत्वपूर्ण मामले ( इंडियन एक्सप्रेस न्यूज पेपर्स बनाम भारत संघ) में उच्चतमन्यायालय ने संप्रेषित किया कि वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निम्नलिखित चार उद्देश्यों की पूर्ति करती है-(1) यह व्यक्ति की आत्मोन्नति में सहायक है;(2) सत्य की खोज में सहायक होती है;(3)यह व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाती है;और (4) स्थिरता व सामाजिक परिवर्तन में युक्तियुक्त सामंजस्य स्थापित करने में सहायक होती है।
अगर आपके मस्तिष्क में यह प्रश्न भी आ रहा हो कि क्या ‘चुप रहने की स्वतंत्रता’ भी भारतीय नागरिक का मूल अधिकार है? इस प्रश्न के जबाब में सर्वोच्च न्यायालय ने विजोय इमेनुअल बनाम केरल राज्य में अभिनिर्धारित किया कि चुप रहने की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन मूल अधिकार है।
सोशल मीडिया के इस दौर में यह उल्लेख करना भी महत्वपूर्ण है कि प्रेस की स्वतंत्रता के सम्बंध में भी सकाल पेपर लि. बनाम भारत संघ में उच्चतमन्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि प्रेस की स्वतंत्रता केवल समाचार पत्रों और साप्ताहिक पत्रों तक ही सीमित नही है,इसमें इसी प्रकार के अन्य प्रकाशन सम्मिलित है जिनके द्वारा व्यक्ति अपने विचारों को एक दूसरे तक पहुचा सकता है जैसे पत्रिका प्रपत्र आदि।

उपरोक्त वर्णित मूल अधिकारों में सड़क पर व्यापार के सम्बंध में भी उच्चतमन्यायालय ने सदन सिंह बनाम नई दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में अभिनिर्धारित किया कि निर्वन्धों के अधीन सड़क किनारे की पटरी पर व्यापार करने का अधिकार अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत मूल अधिकार है।
मूल अधिकारों की श्रृंखला में अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के सम्बंध में संरक्षण की बात करता है जिसमें(1)कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक सिद्धदोष नही ठहराया जाएगा,जब तक कि उसने ऐसा कोई कार्य करने के समय,जो अपराध के रूप में आरोपित है,किसी प्रवृत्त विधि का अतिक्रमण नही किया है या अधिक शास्ति का भागी नही होगा जो उस अपराध के लिए किए जाने के समय प्रवृत्त विधि के अधीन अधिरोपित की जा सकती थी।(2)किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दंडित नह किया जाएगा।(3)किसी अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नही किया जाएगा।( आत्म अभिशंसन के संदर्भ में उच्चतमन्यायालय द्वारा नंदिनी सत्पथी बनाम पी एल धनी के मामले में अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 20(3) का संरक्षण केवल न्यायालय में ही नही,बल्कि वहाँ भी प्राप्त होगा जहां दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161(2) के अधीन पुलिस अभियुक्त से पूछताछ करती है)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण का प्रावधान उल्लेखनीय है जो कहता है कि किसी व्यक्ति को ,उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के शिवाय वंचित नही किया जाएगा। वैयक्तिक स्वतंत्रता की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ए के गोपालन बनाम मद्रास राज्य में अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 21 में वैयक्तिक स्वतंत्रता का अर्थ भौतिक शरीर की स्वतंत्रता मात्र से नही है । मेनका गांधी बनाम भारत संघ में वैयक्तिक स्वतंत्रता पर उच्चतमन्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि वैयक्तिक स्वतंत्रता अभिव्यक्ति अत्यंत ब्यापक आयाम वाली है और इसके अंतर्गत ऐसे बहुत से अधिकार सम्मिलित हैं जिनसे व्यक्ति की वैयक्तिक स्वतंत्रता का गठन होता है साथ ही जीवित रहने के अधिकार की विस्तार से ब्याख्या करते हुए कहा है कि यह अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नही है बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुए जीने का अधिकार सामिल है , सतवंत सिंह बनाम असिस्टेंट पासपोर्ट ऑफिसर के मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त वैयक्तिक स्वतंत्रता शब्दावली में संचरण अर्थात इच्छानुसार कही भी,कभी भी जाने का अधिकार आता है और इसमें विदेश भ्रमण भी शामिल है।
एक महत्वपूर्ण मामले(हुस्सैनारा खातून बनाम विहार राज्य) में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि ‘शीघ्रतया विचारण’ और निःशुल्क विधिक सहायता एक मूल अधिकार तथा अनुच्छेद 21 का एक भाग है।
जहाँ तक न्यनतम मजदूरी व जीविकोपार्जन का संबंध है इसे भी सर्वोच्चन्यायालय द्वारा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मूल अधिकार माना है।
क्या ‘मरने का अधिकार’ मूल अधिकार की श्रेणी में आता है इस पर उच्चतमन्यायालय ने ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य में स्पष्ठ किया है कि जीवन के अधिकार के अंतर्गत मरने का अधिकार शामिल नही है।
छियासिवा संविधान संसोधन के बाद अनुच्छेद 21क के अंतर्गत अब 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के उम्र के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार है जिसके तहत निःशुल्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार न केवल मूल अधिकार है बल्कि अनिवार्य भी है।
अनुच्छेद 22 में कुछ मामलों में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण का प्रावधान मूल अधिकार के रूप में किया गया है जिसमे(1) किसी व्यक्ति को जो गिरफ्तार किया गया है,ऐसी गिरफ्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराएं बिना अभिरक्षा में निरुद्ध नही रखा जाएगा या अपनी रुचि के विधि व्यवसायी के परामर्श करने और प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से बंचित नही रखा जाएगा।(2) प्रत्येक व्यक्ति को,जो गिरफ्तार किया गया है और अभिरक्षा में निरुद्ध रखा गया है,गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर ऐसी गिरफ्तारी से चौबीस घंटे की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा और ऐसे किसी ब्यक्ति को मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना उक्त अवधि से अधिक अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध नही रखा जाएगा।
अनुच्छेद 23 में जहाँ मानव के दुर्व्यवहार,बेगारी व बलात श्रम का प्रतिषेध है वही अनुच्छेद 24 में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के कारखानों आदि में नियोजन पर प्रतिषेध का प्रावधान है। अनुच्छेद 25 से 28 में धर्म की स्वतंत्रता के अधिकारों का प्रावधान किया गया है ।
संस्कृति व अल्पसंख्यको के शिक्षा संबंधी मूल अधिकारों का प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 व 30 में दिए गए हैं।भाग तीन में प्रदत मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार की गारंटी अनुच्छेद 32 में दी गयी है जिसके अंतर्गत समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में समावेदन करने का अधिकार प्रत्याभूत किया गया है।

यदि किसी भी नागरिक को उसके मूल अधिकारों से वंचित रखा जाता है तो यह राज्य अथवा केंद्र सरकार का दायित्व है कि इस हेतु वे सभी आवश्यक कदम उठाए जाय ताकि संविधान में प्रदत्त मूल अधिकारों से कोई भी नागरिक वंचित न रहे।
(लेखक- डीके जोशी,अधिवक्ता उत्तराखंड उच्च न्यायालय नैनीताल,dkjoshigarur@gmail.com)

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