इसका नाम गरूर कैसे पड़ा इस बारे में एक बार मेरी आमा ने बताया था कि गरुड़ गंगा नदी के किनारे बसे इस छोटी सी घाटी को गरुड़ घाटी कहा गया और गरूर गंगा के बारे में कहा की इस नदी के मूल में गरूर(पक्षी) के आकार के पत्थर से पानी निकलता है जो धीरे धीरे आगे चलकर नालों और गधेरों के साथ मिलकर नदी का रूप ले लेती है इसलिए इसे गरूर गंगा कहा गया। खैर मेरी आमा की मान्यता में कितनी सच्चाई है ये तो भगवान ही जाने। अपना गरूर शुरू होता है भगवान गोलू देवता के पूज्य स्थल से जो कि नदी के ठीक उस पार बना हुआ है जहां पुल का दूसरा सिरा खत्म होता है और गरूर शुरू होता है। कोई गरुड़ कहता है कोई गरूर कहता है लेकिन जो भी हो बड़ा ही सुंदर है अपना गरूर। आज तक कोई भी मुझे ये नही बता पाया की कहाँ से कहा तक कि जगह को गरूर कहा जाए। क्योंकि अगर गरूर घाटी कहें तो उसमें टीट बाजार, बैजनाथ, पाए, नौघर, लालपुल, टानीखेत और आस पास का क्षेत्र आ जाता है लेकिन टीट बाजार में खड़े होकर आप अपने घरवालों या दोस्त को नही कह सकते कि आप गरूर में हैं। हा दूरी मायने रखती है जैसे आप किसी ऐसे व्यक्ति को जब अपना पता बताते हैं जिसने शायद गरूर नाम कभी सुना देखा नही हो तब आप उसे बागेश्वर या अल्मोड़ा, नैनीताल या उत्तराखंड बताते हैं। विकास की दृष्टि से गरूर अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि गरूर सिर्फ विकासखंड ही नही है बल्कि यह सभी ग्रामसभाओं को खुद से जोड़ता है। यह उस चौराहे की तरह है जहां आकर सभी रास्ते एक हो जाते हैं। गरूर से ही सभी गांवों और ग्रामसभाओं का विकास जुड़ा है। अगर आपको गरूर विकासखंड के गांवों का विकास जानना हो तो आप गरूर के विकास की झलक देख सकते हैं। गरूर की जो तस्वीर आपको दिखाई देती है वही वैसी तस्वीर आप यहां के ग्राम सभाओं की भी खींच सकते हैं अपने मन मस्तिष्क पर। कूड़ा निस्तारण की समस्या यहां बहुत पुरानी है क्योंकि पूरे कस्बे का कूड़ा नदी किनारे उड़ेल दिया जाता है जो आंधी तूफान या बारिस में उड़कर सड़क पर बह जाता है और दुर्गन्ध फैलाता है। हालांकि इसके निस्तारण के कई बार प्रयास किये गए हैं लेकिन एक स्थायी समाधान और योजना आजतक नही बन पाई। इसके बाद सबसे बड़ी समस्या मुझे सार्वजनिक शौचालय का नही होना लगता है, इसके न होने से महिलाओं को अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई दशकों से शासन प्रशासन अपने गरूर में एक सार्वजनिक शौचालय का निर्माण नही करा पाया। समस्या देखने में छोटी भले लगती हो लेकिन जब खुद पर ऐसा संकट आये तब आदमी कोने ढूढने लगता है और शायद आदमी तो कोना पकड़ भी लेता हो लेकिन किसी महिला की असहजता और असुविधा को जरूर समझना चाहिए। गरूर हमारे दिलों पर राज करता है लेकिन इसके विकास के लिए हमारी निष्क्रिय भूमिका भी बहुत कुछ कहती है। अगर खुद को या सभी ग्राम सभाओं को गरूर से जोड़ कर देखा जाए और इसे सभी का केंद्र मान लिया जाए तो उस हिसाब से गरूर को एक साधन संपन्न कस्बा होना ही चाहिए। हॉस्पिटल हो या स्कूल, सड़कें हों या रास्ते, पेयजल हो या सार्वजिक शौचालय, पब्लिक ट्रांसपोर्ट हो या प्राइवेट, कानून व्यवस्था हो या सुरक्षा, इन सभी महत्वपूर्ण मुद्दों का समाधान जमीनी स्तर पर होना अनिवार्य है। दशकों से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बैजनाथ की हालत में कोई सुधार नही हुआ है। डॉक्टरों और संसाधनों की कमी के कारण मरीजों को अल्मोड़ा या हल्द्वानी की ओर रुख करना पड़ता है। गंभीर बीमारी या इमरजेंसी जैसी स्तिथि में बेहतर इलाज की कोई सम्भवनाएँ अभी नजर नही आती हैं। व्यापार की दृष्टि से भी गरूर एक मुख्य केंद्र है जहाँ से सुदूर गांवों तक आवश्यक संसाधनों को ढोया जा सकता है। लेकिन इतने वर्षों में छोटे किसानों के लिए कोई विस्तृत कार्य योजना धरातल पर नही दिखाई दी। हालांकि लाखों की कीमत से बनी किसान मंडी बाजार योजना सफल नही हो पाई। इसका कारण किसानों को इस योजना से जोड़ पाने में नाकाम रहना हो सकता है। अब इस तथाकथित संडे बाजार की बिडलिंग के आगे और अंदर बाहर गाड़ियां खड़ी रहती हैं और उन गाड़ियों की सर्विसिंग का कार्य किया जाता है। बेहतर होता कि इसे सार्वजनिक यात्री विश्राम गृह के रुप में विकसित किया जाता ताकि इससे यात्रियों और पर्यटकों को गरूर में रुककर घूमने या खरीददारी करने का अवसर प्राप्त होता और उससे व्यापार और पर्यटन में बढ़ोतरी होती। इसी जगह अगर सार्वजनिक शौचालय भी विकसित किया जाए तो एक महत्वपूर्ण समस्या का समाधान भी इसी के साथ हो जाता। इसी के साथ साथ गरूर में इसी बिल्डिंग के साथ साथ या उचित जगह देखकर पार्किंग प्लेस का निर्माण किया जाए तो ट्रेफिक की समस्या से भी निजात पाया जा सकता है। धीरे धीरे गांवों से लोग गरूर या निकटवर्ती क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं इसका मुख्य कारण स्कूल कॉलेज और अस्पताल की गांवों से दूरी का होना है। इसलिए भी आने वाले कुछ सालों में गरूर की भूमिका महत्वपूर्ण होंने जा रही है। अगर अभी से इसके समावेशी विकास पर कार्य नही किया गया तो आने वाले वर्षों में जनसंख्या का दबाव और संसाधनों की कमी के कारण हालात और बेहतर होने की बजाय बिगड़ने लगेंगे। इसलिये मेरा और हम सब का ये दायित्व है कि अपने गरूर के विकास और संसाधन पूर्ण बनाने के लिए प्रयासरत रहें। जनप्रतिनिधियों व प्रशासन के साथ इस कार्ययोजना को अमल में लाने के लिए दबाव भी बनाना पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहें। ये गरूर हम सब का है और हम सभी का सरोकार इससे जुड़ा हुआ है। इसके विकास के साथ ही सभी गांवो का वीकास जुड़ा हुआ है। भविष्य को बेहतर बनाने के लिए आज आपकी सक्रियता अतिमहत्वपूर्ण होगी।
सुंदर बोरा (Journalist)