सुन्दर कौसानी

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दो-दो जिले जहाँ मिलते, कोई न जिसका सानी है।
हिमालय का विस्तार दिखाता, सुन्दर कौसानी है।।
ठण्डी हवा है निर्मल पानी, निश्छल मन, बेबाक बयानी है।
स्वर्ग धरा पर उतरा है, नहीं गढ़ी यह कोई कहानी है।।
बापू के चरण रज पड़े जहाँ पर, ईश प्रार्थना यहीं की थी।।
कवि के उघड़े प्रथम चक्षु , यहीं सुमित्रा नन्दन वीथी।।
सरला की यह कर्म भूमि , राधा की जुड़ी दिवानी है।
ममतामय शीतल आश्रम की, क्या स्नेह भरी वाणी है।।
बागान उगलते कोपल चाय, सड़कों पर चरती बिनी गाय।
आलू के भर-भर खेत उगाता, गाँव समीप छानी है।।
बुराँश गुफइया डाल -डाल ,दारू,बाँज के छाँव साथ।
जोड़ो के मन को भा जाये, घटती नहीं याद पुरानी है।।
अरे सर्प सी सड़क जमीं पर,सर -सर वाहन सरके भर- भर।
गोपालक के भरे पात्र में दूध बिना पानी है।।
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मोहन जोशी

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