भारत छोड़ो आंदोलन में रहे सक्रिय
गरुड़ में साधन सहकारी समिति की स्थापना की
मटेना गांव के पहले निर्विरोध सभापति भी रहे
देश की आजादी में कत्यूर घाटी के अनेक सेनानियों ने भाग लिया।इन्हीं सेनानियों में से एक थे- शिवदत्त त्रिपाठी।शिवदत्त त्रिपाठी का जन्म 10 दिसंबर 1901, 3 गते पौष संवत 1958 को ग्राम मटेना ( भंडारीधार ) तत्कालीन जिला अल्मोड़ा ( अब बागेश्वर ) में तारादत्त त्रिपाठी के घर मे हुआ था।ब्रिटिश सरकार ने वंश परंपरा के अनुसार गांव के पधान होने के कारण उनके परिवार को गड़सेर, भकुनखोला, महरपाली और मटेना चार गांवों की मालगुजारी दी थी और बद्रीनाथ गूंठ का भंडारी भी बनाया था।बाल्यकाल में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण शिवदत्त रोजगार की तलाश में मुंबई चले गए।वहां कत्यूर घाटी के प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी स्व. जयबल्लभ ममगाई की प्रेरणा व सानिध्य में वे कांग्रेस के सदस्य बने और जल्दी ही वापस गरुड़ आ गए।उन्होंने स्व. बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में कुली उतार आंदोलन में भी भाग लिया।वे कांग्रेस के सिपाही के नाते गरुड़ क्षेत्र में आजादी के लिए काम करते रहे।15 अगस्त 1941 को जिला कांग्रेस कमेटी के निर्देश पर उन्होंने बैजनाथ में सर्वप्रथम सत्याग्रह किया और गिरफ्तार कर लिए गए।उन्हें नौ माह का कारावास और 200 रुपए जुर्माना किया गया। ” भारत छोड़ो आंदोलन ” में वे सक्रिय भागीदारी कर रहे थे तभी अंग्रेजों ने उनके गांव मटेना जाकर उन्हें बंदी बना लिया।28 सितंबर 1942 को उन्हें 6 वर्ष की कड़ी कैद एवं 200 रुपए जुर्माने की सजा तथा 29 सितंबर 1942 को 4 वर्ष का कठोर कैद, 200 रुपए जुर्माना एवं 20 बेतों की सजा दी गई।लखनऊ जेल में आंदोलनात्मक गतिविधियों के कारण उन्हें काल कोठरी में भी रखा गया।साल 1946 को वे जेल से रिहा हुए।शिवदत्त त्रिपाठी स्वाधीनता के महान योद्धा होने के साथ हो सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता व समर्पित गांधीवादी थे।आजादी के बाद वे गरुड़ क्षेत्र के विकास के लिए हमेशा चिंतित रहते थे।उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर साधन सहकारी समिति की स्थापना की और उसमें काम भी किया।वे गड़सेर-मटेना के पहले निर्विरोध और प्रथम सभापति रहे।गड़सेर में ब्लाक मुख्यालय का प्रस्ताव उनके ही कार्यकाल में पारित हुआ।1978 में स्व. इंदिरा गांधी को बंद करने के खिलाफ मूवमेंट में भी वे गिरफ्तार किए गए।26 मई 1979 को ग्राम देवरिया में कैंसर रोग से उनका निधन हो गया।वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए समाज सुधार के कार्यों और चिंतन की प्रासंगिकता आज भी जीवंत है। (चंद्रशेखर बड़सीला, गरुड़)